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इस विराट प्रासाद के प्रांगण में सुबह-सुबह आकाश की लालिमा की ओर देख रही थी मनीषा।आकाश की यह निर्विच्छिन्न कोमलता।सिंफोनी की तरह आकाश।उसी मधुर संगीत से झंकृत यह प्रकृति।
क्यों? कल शाम को काउल की आँखें इसी तरह रंगीन होती जा रही थी आंसुओं के पहले स्पर्श की तरह।काउल, तुमने त्याग,उपभोग करना सीखा है,मगर अधिकार जताना नहीं।हरपल मैं प्रतीक्षा करती रही कि तुम